Friday, 31 August 2012

मेरे महबूब ....तेरे लिए (भाग-४)


अपने हर जख्म हर दर्द अब मेरे हवाले कर दो 
अपनी हर एक गम अपनी उलझनें मेरे हवाले कर दो 
मेरे होते अगर तुमको कोई दर्द सताए 
खुदा मेरा मुझको अभी इसी वक्त उठाये 
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अब प्यार को कोई और नाम देकर गुमराह ना कर खुद को 
तेरे दिल में जो मोहब्बत है उस से इनकार ना कर खुद को 
मुझे मालूम है तेरे एहसास जो है मेरे लिए तेरे दिल में 
उन एहसासों को अपनी मोहब्बत से भर दे मेरे दिल में 
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मैं दूर कहाँ तुमसे 
तुम्हे बस दूरी का एहसास होता है 
मेरी मोहब्बत मेरी वफ़ा 
हर वक्त तेरे दिल के पास होता है 
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अब कैसे बताएं तुझे कि 
हम तुझसे कितना प्यार करते हैं 
डरते नहीं इस जहाँ से हम 
सरेआम अपने प्यार का इकरार करते हैं 
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मेर्री मोहब्बत का 'गर ये सिला है 
कि इसके बदले तेरा नफरत मुझे मिला है 
चीर के सीना ही दिखा देता तुझको 
किस क़दर तुझसे मोहब्बत है मुझको 
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अब क्या कहूँ मैं तुझसे ए सनम 
मेरी मोहब्बत के वादों को झूठा बताया तुने 
मैंने तो अपने खून से लिखा था वो मज़मून 
जिसे बस रंगों का खेल बताया तुने 
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तो खुल कर अपने दिल की बात वो बताते क्यूँ नहीं 
'गर प्यार है उनके भी दिल में तो जताते क्यूँ नहीं 
मैं तो बाहें खोले कब से खड़ा हूँ उनकी राहों में 
पर वो हैं कि अब भी झिझकते हैं आने से मेरी बाहों में 
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अब शमा बुझने की बात ना करे 
चाँद अब काली कोई रात ना करे 
शर्म तो उनका गहना है 
पलकें झुका कर कह दें वो जो कहना है 
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वक्त ने हमसे कभी ये वादा लिया था 
वक्त से हम ना कभी टकरायेंगे 
'गर वक्त कहेगा ठहरने कभी
हम उस वक्त वहीँ ठहर जायेंगे
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मैं समेटता हूँ तुमको अपनी बाहों में 
तुम बिखरने की बात करती हो 
हर खुशी समेट ली है मैंने बस तुम्हारे लिए 
और तुम हो कि बस रोने की बात करती हो 

मेरे महबूब ....तेरे लिए (भाग-३)

अभी तो रात बस जवान हुई है 
खत्म ये कहानी भी कहाँ हुई है
देखो तुम ख्वाब मिलन वाले 
आज हमारी कहानी रवां हुई है 
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अभी और इसी वक्त है वो शमा 
फिर ना जाने मैं कहाँ और तू कहाँ 
कहनी है तो कह दे अपने दिल की बात 
आज मौसम भी है..मौका भी है..और है चाँद रात 
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फूलों से 'गर महक चली जाए
वो फूल नहीं कागज का टुकड़ा है 
रिश्तों से अगर चाहत चली जाए 
फिर वो रिश्ता नहीं बस एक मुखडा है
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हम तुम पर इस क़दर मर मिटेंगे
तुम जिधर देखोगे बस हम दिखेंगे 
देखना तुम भी ये हमारे बाद 
इस प्यार की दास्ताँ दुनियावाले लिखेंगे
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जिंदगी कितनी खूबसूरत होती 
जो तेरी चाहत अधूरी ना होती 
कुछ उलझनें कुछ मजबूरियां होतीं बेशक 
मगर प्यार में इतनी दूरियां ना होतीं 
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मिलने से पहले बिछड़ने की जो बात करते हो 
तुम तो अपने ही यकीं पर तुषारापात करते हो 
मुझे तो अपने प्यार पर खुद से ज्यादा भरोसा है 
तुम हो कि इस प्यार पर सरेआम बात करते हो 
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तुमने अपने दिल में देखा ही नहीं 
मोहब्बतों का सैलाब उमड़ रहा है वहाँ 
फिर कैसे कह दिया अकेले हो तुम 
जब उस दिल में मेरी मोहब्बत है जवां 
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क्यूँ मिटाती हो मेरी यादों को अपने दिल से 
क्यूँ हरदम रहती हो यूँ खफा अपने दिल से
तुम्हारे उस दिल में मेरा प्यार बसता है सनम 
और कुछ नहीं बस करो प्यार अपने दिल से 
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अब जब मोहब्बत की शाम आई है 
मेरे हाथों में तेरे नाम की जाम आई है 
मत करो अब यूँ कभी रोने की बात 
मेरी चाहत तेरे सदके के काम आई है 
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अब अदा कहो या इसे मेरी मोहब्बत 
ऐसा ही हूँ मैं इसे मेरी वफ़ा समझो 
ज़ख्म तुझको देने से पहले फना हो जाऊंगा मैं 
मुझको तुम कभी बेवफा ना समझो 
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सनम मेरे जब दिल में मैं बसा हूँ तेरे 
तनहा कभी हो नहीं सकती तू होते हुए मेरे
क्यूँ खुद को हरदम यूँ तुम जलाती हो 
दिल टूटने की बात से मुझको तुम रुलाती हो 
------------- 
बेवफाई का शायद तुम्हे तजुर्बा नहीं 
खामोश हूँ तो ये मत समझो 
मोहब्बत का मुझमे जज़बा नहीं 
दिल चीर कर जब भी देखोगे मेरा
तुम्हारा प्यार दिखेगा और कुछ नहीं 
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मैंने तो तेरे दिल में अपना आशियाँ बनाया है 
मोहब्बत के सितारों से उस आशियाँ को सजाया है 
अब जाना कहाँ है तुम्हे मुझको पाने के लिए 
बस झांक अपने दिल में और कह तुने मुझे बुलाया है


दिल की बात

दिल की बात

किस से बताएं

जाने क्यूँ लगता है

सबसे छुपायें

बात दिल की

दिल में ही रह गयी तो

साथ मेरे राख के

वो भी बह गयी तो

कोई कभी ये

जान नहीं पायेगा

मेरी हसरतों मेरी चाहतों को

पहचान नहीं पायेगा

फिर भटकेगी रूह मेरी

यूँ ही प्यासी प्यासी

मर के भी हिस्से में मेरे

आएगी उदासी

कोई होता जिस से

कर लेते दिल की बात

चीर के दिल अपना

दिखलाते अपने जज़्बात

ऐसा कोई

साथी नहीं है

दिया है पर

बाती नहीं है

अकेला हूँ मैं

इस पूरे जहां में

साथी अब अपना

ढूंढूं कहाँ मैं

साँसें किसी दिन

यूँ ही थम जायेंगी

रगों में लहू

सर्द हो जम जायेंगी

दिल की बात

मेरे दिल में ही रह जाएगी

राख बन कर मेरे साथ

ये भी बह जाएगी 

बंदिशें

क्यूँ

हमारी चाहतें

बंदिशों का मोहताज़ होती हैं

सुना था

चाहतें

दिलों का सरताज होती हैं

फिर क्यों नहीं

उसे

बादशाहत का रूतबा मिलता है

आखिर क्यों

वो हरदम

ग़म में डूबा मिलता है

अगर

बंदिशें ही लगानी थीं

फिर

चाहतों को बनाया क्यूँ

लगाकर

इस पर बंदिशें

इसे नेमत में अपनी

गिनाया क्यूँ

ना होतीं चाहतें तो

ज़िन्दगी

कितनी आसां होती

ना किसी बात से

परेशां होती

न किसी बात पे

हैरां होती

चाहतें अगर बनायीं है

तो ए खुदाया

चाहा जिसको मैंने

उस से मुझको

क्यूँ नहीं मिलाया 

Tuesday, 28 August 2012

ज़िन्दगी क्या है


ज़िन्दगी क्या है 

ख़्वाबों की बंदगी है 

मिल जाये 'गर 

तो अपना है वो 

टूट जाए 

तो सपना है वो 

क्यूँकर गिने 

कितने पल की है 

ये ज़िन्दगी 

क्यूँ ना 

हर पल को बना दें 

हम ज़िन्दगी 

इतना जी लें 

हर पल को 

चाहत ना बचे 

इक पल को 

ज़िन्दगी हमसे 

मोहलत मांगे 

हम कहें 

चलो आगे 

मेरी मोहब्बत

कितनी

अजीब सी कहानी है

मेरी मोहब्बत

आजमाने की

कितनी

कोशिश की मैंने

उसके पास आने की

पर इसे

मेरी किस्मत समझो

या फिर

साज़िश

ज़ालिम ज़माने की

दूर हुयी वो मुझसे

उतनी ही

ख्वाहिश थी

जितनी पास आने की 

मेरी कवितायेँ

ए मेरी कवितायेँ

तू  कहाँ 

ले जा रही है मुझे 

जाने अनजाने 

कितने लोगों से 

मिलवा रही है मुझे 

सबसे 

कितना स्नेह 

कितना अपनापन 

दिलवा रही है मुझे 

ये देख मेरी आँखें 

अक्सर छलक जाती हैं 

ख़ुशी के आंसू 

गालों पे ढलक आती हैं 

ईश्वर करे 

ऐसे ही लिखता रहूँ मैं 

हर रोज़ 

इक नयी कविता के साथ 

सबको दिखता रहूँ मैं 

सबका स्नेह 

सबका आशीष 

मुझे यूँ ही मिलता रहे 

हरदम 

मेरे चमन में 

कविताओं का फूल 

खिलता रहे 

हरदम 

Monday, 27 August 2012

तुम एक कविता हो

सर से पांव तक 

तुम एक कविता हो 

निर्झर सी बहती हुयी 

जीवन की सरिता हो 

अप्रतिम सुन्दरता का 

प्रतिरूप हो तुम 

ठिठुरती हुयी छाँव में 

गुनगुनी सी धुप हो तुम 

आँखें तुम्हारी मयखाने हैं 

होठ छलकते पैमाने हैं 

लेती हो जब तुम अंगड़ाईयाँ 

झुक जाती है फूलों की डालियाँ 

झुकती हैं जब पलकें तुम्हारी 

खिल जाती है गुलशन सारी 

झटकती हो जब तुम 

अपनी जुल्फों से पानी 

जाने कितनी भटकती रूहें 

पा जाती हैं जिंदगानी 

तुम्हें छूकर 

हवा जो जाती है 

तुम्हारी खुशबु से 

सारा गुलशन महकाती है 

तुम्हारे काले नशीले 

गेसू घनेरे 

जैसे घटा घनघोर छाए 

सवेरे सवेरे 

तुम्हारी कलाई पे सजी 

ये चूड़ियाँ सतरंगी 

कर देगी हमारे मिलन की 

घड़ियों को रंगीं 

गले से अपने अब 

तुम लगा लो मुझको 

कोई ख्वाब नहीं 

हकीक़त हो तुम 

यकीं दिला दो मुझको 


तेरे लिये

तुम क्या गयी

जिंदगी बदल गयी

साँसें आती जाती रही

बदन से रूह निकल गयी

मैं तो इक आवारा बादल था

भटकता दीवाना पागल था

तुमने जीना सिखाया मुझे

जीने के काबिल बनाया मुझे

बिखरे तिनकों को जोड़

मेरा घर बसाया था तुमने

मेरे जीवन की बगिया को

गुलशन सा महकाया था तुमने

तुमने सपनों से अपने

जिंदगी मेरी संवारी थी

तभी तो मैंने दुनिया अपनी

सारी तुझ पे वारी थी

तुम क्यूँ चली गयी

मुझसे यूँ रूठ कर

बिखर गया हूँ मैं देखो

खुद से टूट कर

मैंने तुम्हारे जज्बातों की

क़दर ना जानी

खेलता रहा उनसे और

करता रहा मनमानी

तू इस तरह जो बिगड़ गयी

दुनिया मेरी देख उजड़ गयी

अब तुम्हारे बिन

इक पल भी रहा नहीं जाता

गम ये जुदाई का

मुझसे सहा नहीं जाता

आ जाओ

कि जीना मेरा ज़रुरी है

मेरे लिये

क्योंकि मांगी थी

ये जिंदगी सनम मैंने बस

तेरे लिये






Sunday, 26 August 2012

तेरे नाम

मैं तेरे नाम की एक शाम

जीना चाहता हूँ 

तेरे नाम की एक जाम 

पीना चाहता हूँ 

चाहतों को अपनी तेरे नाम 

करना चाहता हूँ 

तू जो इज़ाज़त दे दे अगर 

अपनी हर सांस पर तेरा नाम 

लेना चाहता हूँ 

दिल की हर धड़कन तेरे नाम 

करना चाहता हूँ 

और क्या कहूं मेरी हमदम 

अपनी ये ज़िंदगी तेरे नाम 

लिखना चाहता हूँ 


घड़ी

घड़ी

जब भी

जो भी

बजाती है

बस

तुम्हारी याद

दिलाती है

उसकी टिक टिक

तुम्हारे धड़कन की तरह

दिल में मेरे

समाती है

और जब

दोनों कांटे

एक दुसरे से

मिलते हैं

यूँ लगता है

तुम्हारी कंचन काया

मुझसे आकर

लिपट जाती है

जाने क्यूँ

अब इस घड़ी से

मोहब्बत सा हो गया है

शायद

इसके होने से

तुम्हारे होने का

गुमां सा हो गया है



क्या हुआ

क्या बताऊँ

क्या हुआ

खुद को ही ढूंढ रहा हूँ मैं

खुद में

जाने मैं कहाँ खो गया

खुद में

ख्वाहिशें औरों की

चाहतें औरों की

ख्वाब औरों की

पूरी की मैंने

पर

मुझे क्या मिला

मैं खो गया खुद में

अब क्या बताऊँ

क्या हुआ

जाने मैं कहाँ खो गया

औरों की

ख्वाहिशें पूरी करते करते

चाहतों का बोझ ढोते ढोते

ख़्वाबों की ताबीर भरते भरते

मैं

मैं कहाँ रहा

मैं खो गया

खुद में

अब ढूंढ रहा हूँ

खुद को

खुद में

जाने मैं कहाँ खो गया

खुद में

मिल जाऊं

मैं अगर खुद में

फिर

दो पल ज़िंदगी की

अपने नाम भी कर दूं

उस दो पल की जिंदगी को

बस अपने लिए जी लूं

फिर

मर सकूं इस सुकूं से

कि

जिसकी मौत हुई

वो मैं ही था

मेरा मैं कहीं

खोया नहीं था






संतानहीन

उनकी कोई संतान नहीं थी 

खुद से उनकी कोई पहचान नहीं थी 

कहने को रिश्तेदार बहुत थे 

दूर उनसे दिल के तार बहुत थे 

घर का हर एक कोना कोना 

रहता था हरदम सूना सूना 

ना कभी किसी के आने की आहट 

ना कभी उनके चेहरे पर मुस्कराहट 

ना कहीं किसी की आस है 

जाने आँखों में कैसी प्यास है 

बस अकेलेपन का अहसास है 

हरदम दिल उदास है 

ज़िन्दगी जैसे बोझ बनी है 

क्योंकि उस से हर रोज़ ठनी है 

काश उनका कोई अपना होता 

उनके आँखों में भी सपना होता 

किसी के लिए वो भी जीते 

पता ना चलता कैसे पल बीतते 

पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ कभी 

ना कोई आया ना कोई गया कभी 

अब उनकी आँखें पथरा चुकी हैं 

फिर भी हर आहट पर टिकी हैं 

अब जीवन के इस मोड़ पर आकर 

कुछ ऐसा नहीं जिसे खुश हों पाकर 

कौन जाने कब कैसी ज़रूरत आन पड़े 

कोई ऐसा नहीं जिनसे इनकी पहचान बड़े 

जाने कैसे ये जीवन सारा काटेंगे 

अपना दुःख जाने किस से ये बांटेंगे 

इनकी हालत देख कलेजा मेरा फटता है 

कहीं भी रहूँ इनसे ध्यान नहीं मेरा हटता है 

इनकी हर ज़रूरत का मैं ही ख्याल रखता हूँ 

ईश्वर के दिए सामर्थ्य से इनकी सेवा करता हूँ 

ईश्वर से मैं अपने हर वक्त प्रार्थना करता हूँ 

इनको हर खुशी दे सकूं यही याचना करता हूँ 












Saturday, 25 August 2012

आ जाओ मेरे पास

आ जाओ मेरे पास इतना

कि

मेरी गर्म साँसें

तुम्हारे गालों से टकरा कर

मुझे

तुम्हारे पास होने का

अहसास दिला सके

तुम्हारे बदन की खुशबू

मेरी साँसों में घुलकर

तुम्हें

नशे की घूँट पीला सके

तुम्हारी बंद आँखों में

तैरते सपने

मेरे होठों का स्पर्श पाकर

मन ही मन इतरा सके

तुम्हारे गेसुओं के घनेरे में

फिसलती मेरी उँगलियाँ

तुम्हें

सुकूं के कुछ पल दिला सके

मेरी बाहों के घेरे में लिपटा

तुम्हारा ये कोमल सा बदन

मेरी सारी कायनात को

हिला सके 

तुम्हारे जाने के बाद

तुम्हारी आहट

मेरे चौखट पर

उदासी फैलाती रही

शायद

तुम छोड़ गयी थी

तुम्हारी परछाईं

तुम्हारे जाने के बाद

हवा के हर झोंके पर

तुम अपने आने का

अहसास दिलाती रही

पर

तुम नहीं आई

तुम्हारे जाने के बाद

मेरी हर महफ़िल

वीरान कर गयी

तुम्हारी खामोशी

नगमें सुनाती रही

यादों में जो तुम आई

तुम्हारे जाने के बाद

भंवरे गुनगुनाना भूल गए

खुशबू फूलों से जाती रही

इक तुम जो ना मुस्कुराई

तुम्हारे जाने के बाद

मंझधार में तो डूबते ही थे

कश्ती साहील पर

डगमगाती रही

आंसुओं की बाढ़ जो आई

तुम्हारे जाने के बाद

जिंदगी जीते थे जिसके लिए

वो जिंदगी ही जाती रही

ग़मों की घटा जो छाई

तुम्हारे जाने के बाद

इक बुत सा बन गया हूँ मैं

बस इक सांस आती जाती रही

जाने कैसी ये सजा पाई

तुम्हारे जाने के बाद


Wednesday, 22 August 2012

तनहाइयां

सोचा ना था 

कभी 

जिंदगी 

इन हालातों से 

गुज़र कर जाएगी 

तनहाइयां

साथ होंगी 

और 

तुम्हारी याद

तडपाएगी 

महफ़िल 

सूना सूना होगा 

और 

खामोशी

नगमें सुनाएगी 

रात 

काली होगी 

और 

सुबह 

कभी ना आएगी 

रास्ते तो होंगे 

मगर 

मंजिल 

नज़र ना आएगी 

जाने कब 

फिर 

ज़िन्दगी में 

खुशियाँ 

लौट कर आएगी 





Tuesday, 21 August 2012

तुम्हारा ख्याल

तुम्हारे ख्यालों से भी

तुम्हारी खुशबू आती है

जब भी तुम्हारा ख्याल आता है

मेरी सांस महक जाती है

ख्यालों में जब तुम

मेरी बन कर आती हो

हर तरफ से बस

फूलों की महक आती है

जब ख्यालों में आकर

तुम मुस्कुराती हो

चांदनी की महक आती है

ख्यालों में

चूमता हूँ जब लब तुम्हारे

गुलाबों की महक आती है

ख्यालों में

जब गले से मेरे लग जाती हो

मेरी सारी कायनात

रजनीगन्धा सी महक जाती है

मैं समझ नहीं पाता हूँ

कि

तुम अंग अंग से फूल हो

या

गुलशन के हर फूल की महक

तुम्हारे अंग अंग से आती है




सत्य श्री साईं नाथ भगवान

अभी कुछ दिन हुए

शिरडी गया था

बाबा के दरबार में

लाखों भक्त वहाँ खड़े थे

मीलों की कतार में

पर कुछ भक्तों की पहुँच बहुत थी

धर्म के बाजार में

खनका के सिक्के सोने चांदी के

सीधे पहुँच गए वो

बाबा के दरबार में

तपती धुप में खड़े रहे

बाकी सारे भक्त

दर्शन के इंतज़ार में

बिकते देख दर्शन को

धर्म के बाजार में

वहीँ लिखी यह कविता

व्यवस्था के प्रतिकार में

आहत मन से करने गुहार

पहुंचा फिर बाबा के दरबार में

 
बाबा ----

तुम तो फकीर हो 

अपनी करतब में अमीर हो 

फिर क्यों 

धर्म के ठेकेदारों ने 

तुम्हें 

सोने चांदी से लाद दिया 

तुम 

कितने असहज दिखे 

स्वर्ण सिंहासन पर 

स्वर्ण मुकुट पहने हुए 

फिर 

क्यों नहीं 

तुमने फ़रियाद किया 

मैंने 

तुम्हें 

मुस्कुराते देखा है 

द्वारका माई में 

चावड़ी की परछाईं में 


पर वो मुस्कराहट 

नहीं दिखी मुझे 

स्वर सिंहासन पर बिराजे हुए 

स्वर्ण मुकुट छाजे हुए 

श्रद्धा भक्ति को 

अब 

तौल रहे सब 

सोने चांदी से 

तभी तो 

हुंडी में तुम्हारे 

खनक रहे हैं सिक्के 

सोने चांदी के 

पर 

इनको ये भान नहीं है 

कि 

तुमको इनका मान नहीं है 

तुम तो खुश होते हो 

उस भिक्षा से 

जो मेहनतकश लाता है 

अपनी इच्छा से 

जाने दो ये अज्ञानी हैं 

अपने धन के अभिमानी हैं 

हम भक्तों की आस 

तुम हो बाबा 

हम क्यों हो निराश 

जब तुम हो बाबा 

हम श्रद्धा सुमन अर्पित करते 

चरणों में तुम्हारे 

समर्पित रहते 

ना सोना है ना चांदी बाबा 

बस श्रद्धा हमारी पूंजी बाबा 

अपनी दया बनाये रखना 

हमको अपने शरणागत करना 

बस यही कामना हम भक्तों की 

धन के आसक्तों की 

चाल सफल होने ना पाये 

सोने चांदी की खनक में 

आशीष तुम्हारा बिक ना जाये 

जो कोई भक्त 

तुम्हारे दर पर आये 

कहीं कभी ठोकर ना खाए 

जो आये जैसे आये 

तुमसे वो सीधे मिल पाये 

तुम तो सबके हो बाबा 

बस ऐसे ही सबके रहना 

सब की विनती सुन सुन कर 

सबके दुःख हरते रहना 





मेरा इश्क

सोचा ना था

ये इश्क मेरा

तड़पेगा कभी

तेरे हुस्न की बंदगी को


हमने तो

खुदा मान कर

तेरी इबादत की है

भूल कर दीवानगी को


देख कहीं

हुस्न तेरा

रुसवा ना करे

मेरे इश्क की पाकीज़गी को


तेरा हुस्न रहे सलामत

मेरे इश्क की बदौलत

यही दुआ है

खुदा की इस ज़िंदगी को 

हुस्न और इश्क

हुस्न का रंग

तब निखर कर

आता है

जब वो इश्क से

टकराता है

फिर

चाँद भी

शरमाता है

इश्क में डूबे हुस्न से

और

शबाब भी

चढ़ आता है

इश्क में डूबे हुस्न पे

इस इश्क से ही तो

हुस्न पे नूर है

इसलिए मत इतराओ

ए हुस्न वालों

हमारा इश्क नहीं तो

तुम्हारा हुस्न बेनूर है 

जीवन के उस पार

जीवन के उस पार

जाने चाहतों का मेला हो ना हो

आओ चाह लें अपनी चाहतों को

जीवन के इस पार


जीवन के उस पार

जाने मोहब्बत के पल मिले ना मिले

आओ कर लें जी भर मोहब्बत

जीवन के इस पार


जीवन के उस पार

जाने रंगों का मेला हो ना हो

आओ रंग लें हर रंग में

तन को मन को

जीवन के इस पार


जीवन के उस पार

जाने खुशियाँ हो ना हो

आओ जी भर के खुशियाँ मना लें

जीवन के इस पार


जीवन के उस पार

जाने गुलशन फूल खुशबू हो ना हो

आओ महका लें अपना गुलशन

जीवन के इस पार


जीवन के उस पार

जाने सावन बरसे ना बरसे

आओ भींग लें हर सावन में

जीवन के इस पार


जीवन के उस पार

जाने जीवन हो ना हो

आओ जी लें जिंदगी जी भरके

जीवन के इस पार 

Tuesday, 14 August 2012

गांव की अमराई

कुछ धूमिल सी

स्मृतियाँ शेष हैं

गांव के अमराई की

जेठ की

तपती दुपहरी में भी

कैसी शीतलता

भर देती

तन मन में

जाने कैसी चपलता

हमारा चंचल मन

कैसे माने

कोई बंधन

भोर होते ही

निकल पड़ते हम

टोलियों में

झुण्ड के झुण्ड

गिल्ली डंडा

जाने कितने

सामान लिए

फिर धुप चढ़े

या लू चले

परवाह किसे

बजे कितने

किसने क्या

फरमान दिए

अमराई भी बौरा जाती

देख देख

सबकी शैतानी

हल्ला गुल्ला होता खूब

जम कर होती मनमानी

कोई नाचता पेड़ों पर

या होती दौड़ मेड़ों पर

गिल्ली उछलती मीलों दूर

कूद के लाते सब लंगूर

गुलेल की सटीक चाल से

अम्बिया गिरती डाल से

रोटी खाते अचार से

छाछ पीते धार से

फिर खेलते आनी जानी

घोघो रानी कितना पानी

होड़ लगती हर बात पर

कौन लट्टू नचाये हाथ पर

कूद कूद के डाल पर

हँसते अपने हाल पर

फिर ढेर लगते पत्थर के

खेलते पिट्टो दम भर के

जाने कहाँ से ताकत आती

जो खाते वो पच जाती

सांझ होते भगदड़ मच जाती

घर घर से हांक जो आती

छोड़ के हम अमराई

घर लौटते सारे भाई

अब ना गांव है ना अमराई

शहर की भीड़ वहाँ तक आई

अब अमराई के नाम पर

वहाँ कुछ ठूंठ अवशेष है

हमारे बचपन की यादों का

अब वही भग्नावशेष है










Sunday, 12 August 2012

मेरा सोलह श्रृंगार

अपने पिया जी का प्यार मैं

उनके हर पल का दुलार मैं

उनको रिझाऊं बार बार मैं

करके अपना सोलह श्रृंगार मैं


सजा के मांग सिन्दूर से उनकी

लगाऊं बिंदिया मैं पसंद की उनकी

आँखों में काजल कजरारे लगाकर

शरमाऊंगी मैं उनसे आँखें मिलाकर


माथे पे टीका कानों में फूल 

नथनिया अपनी कैसे मैं जाऊं भूल

हार नौलखा गले में डाल के

चूडियाँ खनकाऊँ उनकी बाहों में झूल


लाल जोड़ा मेरा अंगूठी औ' बाजूबंद 

लचके कमर पे मेरा प्यारा कमरबंद

हाथों में लगा के मेहँदी उनके नाम की

बन गयी दीवानी मैं अपने श्याम की


पायल बिछुए डाल के पांव में

रहूँ मैं अपने पिया जी की छांव में

इत्र की खुशबू मेरे बदन की

फ़ैली सारी उनके गांव में


करके मैं अपना सोलह श्रृंगार

खड़ी हूँ अपने पिया जी के द्वार

अभी पिया जी मेरे आयेंगे

मुझे देख देख इतरायेंगे


मैं वारी न्यारी हो जाऊंगी

बाहों में पिया के खो जाऊंगी

सुहाग मेरा यूँ ही बना रहे

आशीष ईश्वर का सदा रहे


( सोलह श्रृंगार के सारे श्रृंगार कविता में अलग से झांक रहे हैं )

Saturday, 11 August 2012

मेरी उड़ान

थक चुका हूँ मैं

चाहतों का बोझ

ढोते ढोते

सब की उम्मीदों से

दबकर

घुट घुट कर

मर गयी हैं

मेरी अपनी इच्छाएं

जो अब शायद

कभी पूरी नहीं होंगी

मुक्त होना चाहता हूँ मैं

इन बंधनों से

उन्मुक्त उड़ना चाहता हूँ मैं

अपने आकाश में

अक्षुब्ध

जहां मेरी उड़ान

किसी दिशा से प्रभावित ना हो

ना ही कोई

हवा का झोंका

मेरी दिशा बदल सके

मैं उड़ता चला जाऊं निरंतर

बिना किसी विराम के

अपने अंतिम नीड़ की ओर

जो जाने कबसे

तिनके की राह तक रहा है

मुझे एक एक तिनका जोड़

उस नीड़ को सजाना है

ताकि

जब मैं थक कर

अपनी उड़ान से लौटूं

मेरी शय्या सजी रहे

अंतिम विश्राम के लिये

वहाँ कोई कलरव न हो

ना हो कोई कोलाहल

चाहे तो भोर भी ना हो

और ना कोई हलचल

बस एक सुकून हो

क्यूंकि

इस थकान के बाद

उस नींद में मुझे सोना है

जिसमें सोकर उठते नहीं हैं

बस चैन की नींद

सो जाना होता है

सबसे बेखबर

कभी नहीं उठने के लिये






Friday, 10 August 2012

यादों के झरोखों से

आज सफर में

फुरसत में बैठा हूँ

तो यादों के झरोखों से

कितनी सारी यादें

झांक रही हैं

उन झरोखों पर पड़ी धुंध को

हाथों से हटाता हूँ तो

कितने सारे लम्हे

सामने से गुजर जाते हैं

यादों की अँधेरी गलियों से निकल कर

क्रम से खड़े हो जाते हैं

मेरी यादों में अपनी

उपस्थिति दर्ज कराने

और प्रतीक्षारत हो जाते हैं

उनसे होकर

मेरे गुजरने के लिये

सोचता हूँ आज जब

समय भी

मेरे साथ फुरसत में बैठा है तो

उन बीते लम्हों को

एक बार

फिर से जी लूं

कितना लम्बा समय निकल गया

हर पल

फिर भी यूँ लगता है

जैसे

अभी अभी

जिया हूँ मैं

बचपन की अठखेलियाँ

यौवन की रंगरेलियां

फिर उनसे मिलना

हमारे प्यार के

फूल का खिलना

मिलना फिर

मिलकर बिछडना

हंसना रोना

पाना खोना

लड़ना पछताना

रूठना मनाना

सब

अभी अभी तो

जिया हूँ मैं

जाने कितनी ऋतुएं बीतीं

पर आज भी

हर वसंत की खुशबू

मेरी साँसों में घुली है

हर बारिश के छीटों से

मेरी यादें आज भी धुली हैं

किसी भी जेठ की तपन

मुझको नहीं भूली है

कभी सुख का सूरज चमका

तो कभी दुःख के बादल छाये

जाने कैसे कैसे मोड़

इस जिंदगी में आये

आज उन सब यादों की

टूटी फूटी तस्वीरें

जुड़कर

एक कोलाज बन गयी है

यादों के झरोखों से

दिखने वाली

मेरी जिंदगी की कोलाज






मेरी प्रियतमा

मेरे ख़्वाबों में बसने वाली

मेरी प्रियतमा

आज फिर मैं तुमसे

मेरी दुनिया में आने की

ज़िद करने वाला हूँ

अब और इंतज़ार नहीं होता

हर पल हर घड़ी बस

कभी ना खत्म होने वाला

तुम्हारा इंतज़ार

अब और इंतज़ार नहीं होता 

कहीं से बस तुम आ जाओ

कितने जतन किये हैं मैंने

बस तुमको पाने के लिये

सबसे बैर मोल लिये हैं मैंने

बस तुमको पाने के लिये

बैरी कितना ये ज़माना है

जब से इसने जाना है

तुम मेरे ख़्वाबों में बसती हो

वहीँ सजती और संवरती हो

ख्वाबों पर मेरे

अब पहरे लगने लगे हैं

अब तुम ही आकर

इनको समझाओ

मुझसे तो ये जलने लगे हैं

तुम कितनी खूबसूरत हो

जैसे किसी मंदिर की मूरत हो

ऐसी खूबसूरती

ना तो किसी ने देखी है

और ना ही किसी ने जानी है

इसलिए तो

सारी दुनिया

तुमसे अनजानी है

जिस दिन तुम

मेरी दुनिया में आओगी

सब के मन को भा जाओगी

पर मैं तुम्हे दिल में

छुपा कर ही रखूंगा

तुम मेरी हो

और मेरी ही रहोगी

हरदम यही कहूँगा


















Thursday, 9 August 2012

मेरी अर्धांगिनी

यादों के झरोखों से 

जब कभी मैं 

अपने अतीत में झांकता हूँ 

इस मंज़र को मैं 

अपने दिल के 

सबसे करीब पाता हूँ 

याद है मुझे 

तुम मिली थी 

जब मुझे पहली बार 

पता नहीं था मुझे 

क्या था तुम से मेरा सरोकार 

जब किसी ने यह बताया 

तुम्हारा रिश्ता मेरे लिये आया 

सच बताऊँ 

मन ही मन 

मैं अपने भाग्य पर इतराया 

फिर वो समय आया 

जब तुम्हें तुम्हारे बाबुल के आँगन से 

ब्याह कर लाया 

विदाई की घड़ी 

अपनों से मिलकर 

कितना रोयी थी तुम 

मन कितना 

व्यथित हुआ था मेरा 

उस सफर में 

जब थक हार कर 

अपना सर 

कितने विश्वास से 

मेरे काँधे पर रख कर 

सोयी थी तुम 

मन कितना 

पुलकित हुआ था मेरा 

तुम्हारे सर का टेक 

अपने काँधे पर देख 

कितनी जिम्मेदारियां 

अचानक ही 

मन में मेरे 

जन्म ले लीं थीं 

जैसे अपना सर टेकते ही 

तुमने 

उनका बीज बो दिया था 

मेरे अंतर्मन में 

और 

वो प्रस्फुटित हो कर 

अपने होने का 

भान करा रही थी मुझे

अब तक अल्हड़ आवारा मैं 

अचानक ही 

कैसे पल भर में 

अपना अल्हड़पन भूल 

एकदम से  संजीदा हो गया 

तुम्हारा मुझपर 

यूँ यकीं करना 

शायद वजह थी 

मेरे यूँ बदल जाने की 

जब तुमने 

चावल की ठेकरी को 

अपने सहमे पांव से 

दरवाज़े पर गिराया था 

यूँ लगा था जैसे 

सैकड़ों तारों का झुण्ड 

ज़मीं पर उतर आया था 

आलता की थाल में 

पांव रख कर 

लहंगे को उचका कर 

तुम ज्यों ज्यों 

चलती रही 

मेरी सारी हस्ती 

तुम्हारे पांव की छाप में 

पिघलती रही 

मैं चोरी चोरी 

तुम्हारी गोरी पिंडलियों को 

निहारता रहा 

और पता नहीं 

किन्हीं अनजाने ख्यालों से 

मन ही मन  

मुस्कुराता रहा 

उस रात 

तुम्हारा पूर्ण समर्पण 

मेरे पूरे अस्तित्व को 

अंदर तक हिला गया था 

वो बस 

तन का नहीं 

मन का नहीं 

तुम्हारे पूरे अस्तित्व का 

समर्पण था 

मंडप में पढ़े गए 

कुछ मन्त्रों से 

मेरी अर्धांगिनी बनी थी तुम 

पर 

उस रात 

तुम्हारे पूर्ण समर्पण से

मेरा पूरा अस्तित्व 

तुम में यूँ विलीन हो गया 

कि 

अब तुम्हारे बिना 

मेरा होना संभव नहीं था 

आज भी 

जब वो पल 

आँखों से होकर गुजरता है 

मेरा रोम रोम 

उन ख्यालों से सिहर उठता है 

तुम्हारे विश्वास की पराकाष्ठा 

की परिणति 

मेरी रानी 

मेरे मन मंदिर में 

तुम्हारी मूरत की 

प्रतिस्थापना से हुयी 

और मेरे प्यार की 

शुरुआत 

मेरी प्रियतमा 

तुम्हारी 

उपासना से हुयी 

वो उपासना आज भी 

अनवरत जारी है 

जन्म जन्मांतर तक

मेरी अर्धांगिनी 

मेरी हर सांस तुम्हारी है 

आज भी जब कभी 

मेरी आँखें तुमको यूँ ही 

निहारती हैं 

खुशियाँ सम्हाल नहीं पातीं 

और छलक जाती हैं 









Wednesday, 8 August 2012

मेरे महबूब ....तेरे लिए (भाग-२)


जाना कहाँ था तुम्हारी महफ़िल से 
शब ने चाँद को भी रोका है उसी दिल से 
आओ कि महफ़िल में बस तुम्हारा इंतज़ार है 
कह दो ना आज सब से कि तुम्हें मुझसे प्यार है 
------------ 
उदासी का कोई सबब हो तो जाने 
सब यही हैं तो फिर क्यूँ उदास हैं  
महफ़िलमुकामरास्ते और गम 
गए कहाँ तुम्हारी महफ़िल से हम 
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वफ़ा के हर इम्तेहां से मैं गुजर चुका हूँ 
आग से और शोलों से मैं लड़ चुका हूँ 
बाद इन सब के तुझको पाया हूँ मैं 
फिर क्यूँ सोचती हो कि पराया हूँ मैं 
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सितारों से तुम अपनी महफ़िल सज़ा लो 
हसरतों को अपने आज मुझसे मिला लो 
कोई हसरत बाकी ना रहे ये एहतियात कर लो 
हमारे मिलने की हर इन्तेज़ामात कर लो 
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तुम तो जाने कब से इस दिल में समाये थे 
आशियाँ हमने भी तुम्हारे दिल में ही बनाये थे 
फिर ना जाने किस खौफ में तुम्हारा दिल जी रहा था 
मोहब्बत सामने था और वो आंसुओं को पी रहा था 
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जो लहू बनकर तुम्हारी रगों में दौड़ता है 
वही हसरत-ए-दिल है तुम्हारा सनम 
जो तुम्हारा साथ नहीं छोड़ता है 
अब तो इस बात से इनकार मत करो तुम 
तुम्हारी हसरत ...तुम्हारा प्यार सब वही है 
------------ 
ज़रुरी नहीं कि हर इश्क दर्द के मुकाम से गुज़रे 
हमने तो बहारों को अपने इश्क की जश्न में बुलाया है 
आखिर इश्क है हमारा कोई मामूली बात नहीं 
फूलों और कलियों से कम और कोई सौगात नहीं 

Tuesday, 7 August 2012

कलंकित कोख

कलंकित

कैसे कहें

उस कोख को

जिसमें बीज

जीवन के

किसी की हैवानियत

ने बोया

और

कलंक का बोझ

उस अभागन ने ढोया

कलंकित

हमारी सोच है

जिसने

ईश्वर की रचना को

कलंक की

संज्ञा दी

उस हैवान की

हैवानियत का क्या

जिसने मर्यादा की

अवज्ञा की

नारी के सम्मान की

उसकी अस्मिता

और अरमान की

धज्जियाँ उधेड़ी

इतना सब कुछ

होने पर भी

उसका नाम

कलंक से

कोसों दूर है

और वह अभागन

कलंकिनी कहलाने को

मजबूर है

कैसी ये विडम्बना है

बिना किसी अपराध के

वो कलंकिनी बनी

और वो अपराधी

हर कलंक से बरी

क्यूँ नहीं

समाज

उसका वहिष्कार करता है

क्यूँ नहीं हर कोई

उसके कृत्यों का

तिरस्कार करता है

क्यूँ वो मासूम

उसकी हैवानियत का

बोझ ढोए

क्यूँ  वो अकेली

खून के आंसू रोये

क्यूँ नहीं

उस हैवान को

उसकी हैवानियत की सज़ा

उसके अंदाज़ में दिया जाए

क्यूँ नहीं

आगे से

ऐसे हर हैवान को

मौत के हवाले किया जाए

फिर कभी कोई कोख

कलंकित ना हो

इसके लिए

लिजलिजे कायदों

की जगह

क़ानून सख्त करना होगा

नहीं तो

हर बार

यूँ ही निर्दोष

हैवानियत की बलि

चढ़ती रहेगी

और उसकी कोख

कलंकित होती रहेगी